daniela ruah dating david olson - Boys sathe balatkar varta

मैं केवल सत्यनिष्ठ हूं | और हिंदुत्व इस्लाम की तरह नहीं है कि जहां कुरान में मुहम्मद के जीवन की व्यक्तिगत घटनाओं का वर्णन किया गया है और उसे न्यायसंगत भी ठहराया गया है | कुरान और हदीसों में इन पर कहानियां भरी हुई हैं कि आयशा जब बच्ची थी तभी मुहम्मद ने उससे शादी क्यों की, क्यों उस ने अपनी पुत्र-वधू से शादी की इच्छा ज़ाहिर की और वास्तव में बिना शादी किए ही सम्बन्ध रखे (दावा किया कि शादी आसमान में हो गई है !

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तब फ़िर ये कथाएं आपकी संस्कृति का हिस्सा क्यों हैं ? किसने कहा कि यह कहानियां हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं ?

जन्मना ब्राह्मण धार्मिक ग्रंथों के सबसे नजदीक हैं | अगर ये हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग होती,तो यह कैसे कहा जा सकता है कि –१.ब्राह्मण समाज (इस लेख में ब्राह्मण से मेरा आशय जन्मना ब्राह्मण से है| ) मात्र भारत में ही नहीं अपितु पूरे विश्व में सर्वाधिक एक पत्नीव्रती समाज है |२.

आप यह दावा कैसे करते हैं कि ये पुस्तकें हमारे धर्म का अंग नहीं हैं ?

उ.मैंने ऐसा नहीं कहा कि यह पुस्तकें हमारे धर्म का हिस्सा नहीं हैं, मेरा कहना है कि वे हमारे धर्म का भाग वहीं तक हैं जहां तक वे वेदों से एकमत हैं |इसका प्रमाण समाज में देखा जा सकता है-१.कोई भी नए असंपादित पुराणों को महत्त्व नहीं देता (सिवाय कुछ लोगों के जिन्हें हिन्दू धर्म से कोई सरोकार नहीं है वरन् वे सिर्फ अपना अधिपत्य जमाना चाहते हैं – झूठी जन्मगत जाति व्यवस्था के बल पर.

यह अग्निवीर की चुनौती है – उन सभी को जो हिन्दुत्व में अश्लीलता दिखाने का प्रयास कर रहे हैं – प्रमाणित करें कि वेद अश्लील हैं अथवा लेख के पहले तीन बिन्दुओं में वर्णित धर्म के लक्षणों को अश्लील प्रमाणित कर के दिखाएँ | ऐसी भूली- बिसरी पुस्तकें जिन्हें हिन्दू संजीदगी से नहीं लेते, उनकी रट लगाने से काम नहीं चलेगा क्योंकि हिन्दुत्व स्वतः ही किसी भी ऐसी बेहूदगी को निकाल फेंकता है – चाहे उसका स्रोत या कारण कोई भी रहा हो | तो इन फर्जी प्रचार के आयोजकों को उनकी आधारहीन कोशिशें बंद कर देनी चाहिए| इसके स्थान पर उनकी अपनी मज़हबी किताबों (आखिरी शब्द तक जिसे वे पूर्ण और अंतिम मानते हैं|) के उन अंशों की एक सूची बना कर तैयार करनी चाहिए जिनकी मौजूदगी में उनका मज़हब अश्लीलता से सराबोर हो रहा है और इस कलंक से बचने के लिए जिन्हें तुरंत निरस्त किए जाने की आवश्यकता है|प्र. लगता है कि आप पर वेदों का भूत सवार है | पर उन मतों के बारे में क्या कहेंगे जो वेदों को ईश्वरीय नहीं मानते और गीता तथा उपनिषदों के बारे में क्या कहना चाहेंगे ? कृपया Vedic Religion in Brief और what is Vedic Religion को ध्यान से पढ़ें साथ ही लेख की शुरुआत में दिए गये धर्म के ११ लक्षणों का भी पुनरावलोकन करें |जो मत या पंथ वेदों के ईश्वरीय होने में संदेह करते हैं वे भी इन्हें अपनाये हुए हैं |२.जिन मतों के बारे में आप का दावा है कि वे वेद विरोधी हैं दरअसल वेदों के नाम पर थोपी गई दुष्प्रथाओं का विरोध कर के अपरोक्षतया वे भी वेदों का ही अनुसरण कर रहे हैं |३.कुरान और बाइबल की तरह वेद किसी काल्पनिक जन्नत को हासिल करने के लिए स्वयं को ईश्वरीय या दैवी घोषित नहीं करते| वेदों के अनुसार निरंतर सत्य का स्वीकार करने से और झूठ को त्यागते रहने से सत्य अपने आप स्पष्ट होता चला जाता है | मेरे लिए वेदों को ईश्वरीय मानने के तर्क और प्रमाण उपस्थित हैं | पर यदि कोई वेदों के ईश्वरीय होने में विश्वास नहीं करता है लेकिन वह पूर्वाग्रहों से रहित होकर अपनी समझ और मंशा का सही उपयोग करे तो वह वेदों का ही अनुकरण कर रहा है |४.

गीता और उपनिषद अद्भुत ग्रंथ हैं, देखा जाए तो गीता के उपदेशों का आधार यजुर्वेद का ४० वां अध्याय ही है | सभी प्रमुख उपनिषदें बौद्धिक खुराक का काम करती हैं, छ: दर्शन और अन्य धर्म ग्रंथ भी इसी तरह हैं | हमारी उन पर श्रद्धा है और वहीं तक है जहां तक वे वेदों के अनुसार हैं | मसलन, अल्लोपनिषद किसी धर्मांतरण के विषाणु का बनाया हुआ एक ज़ाली उपनिषद है |५. हिन्दुत्व पर जैसे- तैसे अश्लीलता थोपने की कुचेष्टा की बजाए अगर आप गीता के दूसरे और तीसरे अध्याय या इशोपनिषद के १७ मंत्रों का स्वाध्याय कर लें तो खरे अर्थों में यहीं पर आप ज़न्नत हासिल कर लेंगे | वैदिक बनें क्योंकि वेदों के अलावा अन्य कहीं धर्म नहीं है |और हिन्दुओं के लिए मैं हिन्दुत्व के आधार को दुहराना चाहूंगा – कुछ भी और सब कुछ जो वेदों के ख़िलाफ़ है, धर्म नहीं है | अतः हिन्दुत्व सिर्फ़ नैतिकता,शुद्धता और चरित्र पर ही आधारित है |सभी निष्ठावान और देशभक्त हिन्दुओं को हिन्दुत्व के इस मूलाधार का चहुँ ओर विस्तार करना चाहिए ताकि हम सफलतापूर्वक धर्मांतरण के वायरस के खतरे से उबार सकें |अग्निवीर की साइट को तो हैक कर लिया गया था | लेकिन हमारे धर्म को विदेशी जड़वादी, हठाग्रही और ज़ुनूनी लोग असहिष्णुता और छल (जो हमारे धर्म का हिस्सा और विचार कभी रहा ही नहीं ) में विश्वास करनेवाले छीन कर ले जाएं यह हम कभी बरदाश्त नहीं करेंगे | Disclaimer: By Quran and Hadiths, we do not refer to their original meanings.

राधा का अर्थ है सफ़लता | यजुर्वेद के प्रथम अध्याय का पांचवा मंत्र, ईश्वर से सत्य को स्वीकारने तथा असत्य को त्यागने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ रहने में सफ़लता की कामना करता है | कृष्ण अपनी जिंदगी में इन दृढ़ संकल्पों और संयम का मूर्तिमान आदर्श थे | पश्चात किसी ने किसी समय में इस राधा (सफ़लता) को मूर्ति में ढाल लिया | उसका आशय ठीक होगा परंतु उसी प्रक्रिया में ईश्वर पूजा के मूलभूत आधार से हम भटक गये, तुरंत बाद में अतिरंजित कल्पनाओं को छूट दे गई और राधा को स्त्री के रूप में गढ़ लिया, यह प्रवृत्ति निरंतर जारी रही तो कृष्ण के बारे में अपनी पत्नी के अलावा अन्य स्त्री के साथ व्यभिचार चित्रित करनेवाली कहानियां गढ़ ली गयीं और यह खेल चालू रहा| इस कालक्रम में आई विकृति से पूर्णत गाफ़िल सरल हिन्दू राधा-कृष्ण की पूजा आज भी उसी पवित्र भावना से ज़ारी रखे हुए हैं | यदि, आप किसी हिन्दू से राधा के उल्लेखवाला धर्म ग्रंथ पूछेंगे तो उसके पास कोई जवाब नहीं होगा, शायद ही कोई हिन्दू जानता भी हो| महाभारत या हरिवंश या भागवत या किसी भी अन्य प्रमाणिक ग्रंथ में राधा की कोई चर्चा नहीं है| अतः सभी व्यवहारिक मामलों में हिन्दुओं द्वारा राधा पर झूठी कहानियों और झूठी पुस्तकों को मान्यता नहीं दी गई है|एक हिन्दू के लिए राधा पवित्रता का प्रतिक है, भले ही वह नहीं जानता क्यों और कैसे ?

यदि हिन्दुओं के मन में राधा – कृष्ण के संबंधों के प्रति कोई अशालीन भाव होता वह राधा के भक्तों के जीवन में झलकना चाहिए था परंतु कृष्ण के उपासक तो एक पत्नीव्रती, बहुधा ब्रह्मचारी रहनेवाले होते हैं जो सहसा अपने से विपरीत लिंग के लोगों में घुलते-मिलते भी नहीं हैं|अतः सभी व्यावहारिक मामलों में हिन्दू राधा – कृष्ण पर सभी झूठी कथाओं और झूठी पुस्तकों को नामंजूर करते हैं|४.शिवलिंग का मतलब है पवित्रता का प्रतीक | दीपक की प्रतिमा बनाये जाने से इस की शुरुआत हुई, बहुत से हठ योगी दीपशिखा पर ध्यान लगाते हैं | हवा में दीपक की ज्योति टिमटिमा जाती है और स्थिर ध्यान लगाने की प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न करती है इसलिए दीपक की प्रतिमा का निर्माण किया गया ताकि एकाग्र ध्यान लग सके | लेकिन कुछ विकृत दिमागों ने इस में जननागों की कल्पना कर ली और झूठी कुत्सित कहानियां बना ली और इस पीछे के रहस्य से अनभिज्ञ भोले हिन्दुओं द्वारा इस प्रतिमा का पूजन पवित्रता के प्रतिक के रूप में करना शुरू कर दिया गया|एक हिन्दू को क्यों और कैसे यह जानने में कोई रूचि नहीं है | वह सिर्फ चीज़ों को ऊपर से देख कर स्वीकारता है और हर कहीं से अच्छाई को पाने का प्रयास करता रहता है| किसी हिन्दू ने शिव पुराण या शिव लिंग से संबंधित अन्य पुस्तकें पढ़ी भी नहीं हैं| वे शिवालय में सिर्फ अपनी पवित्र भावनाएं ईश चरणों में अर्पित करने जाते हैं| अतः सभी व्यावहारिक मामलों में हिन्दुओं द्वारा शिव लिंग के बारे में सभी झूठी कथाओं और झूठी पुस्तकों को अस्वीकार किया गया है|५.हिन्दू लोग अपने धर्म का मर्म यही मानते हैं कि एक ही सत्य का साक्षात्कार अलग-अलग तरीकों से किया जा सकता है | अतः वे हर किसी को विद्वान समझ बैठते हैं, उसके पीछे चलने लगते हैं और भ्रम में रहते हैं कि वे भलाई के मार्ग पर हैं | लिहाज़ा कुछ हिन्दू अजमेर शरीफ़ की दरगाह पर चादर चढ़ाने के लिए दौड़े जाते हैं – जो पृथ्वीराज चौहान के खिलाफ़ -मुहम्मद गौरी का साथ देनेवाले गद्दार की मज़ार है | शिवाजी के हाथों मारे गये -कुख्यात लुटेरे और बलात्कारी अफ़ज़ल खान की कब्र पर भी हिन्दू माथा टेकते नज़र आएंगे | हिन्दुओं की हर किसी में अच्छाई ही देखने की मूलभूत प्रवृति जो उनको उपासना की हर एक पद्धति को अपनाने के लिए प्रेरित करती है – आज उसके विनाश का कारण बन गयी है|जिस तरह आप यदि स्वास्थ के नियमों का पालन, पथ्यापथ्य, औषध इत्यादि का ध्यान नहीं रखेंगे तो आप नयी दिल्ली जैसी जगह पर डेंगू से नही बच सकते | उसी तरह, हमारे वेदों के मूलभूत विचारों को अगर हम ने पकड़ कर नहीं रखा, कोई सशक्त उपाय नहीं किया एवं चौकन्ने नहीं हुए तो बहुत आसानी से हिन्दू समाज भी संक्रमित हो जाएगा|संक्षेप में, हिन्दू सिर्फ अच्छाई को ही पूजते हैं | वे इस अच्छाई को पूजा के हर स्वरुप में तलाशते हैं | वे इसके पीछे की कहानियों की परवाह नहीं करते इस प्रकार की पूजाओं की उत्पत्ति कैसे हुई और उनके पीछे क्या षड्यंत्र है , इस बारे में भी नहीं विचारते और अच्छाई ढूंढते रहते हैं|इसलिए यद्यपि हिन्दुओं को बहुत सावधानी बरतनी चाहिए किन्तु यह भी सच्ची बात है कि हिन्दू धर्म के सिद्धांतों या व्यवहारों में ऐसी कथाएं और पुस्तकें समाहित नहीं हैं| उ.इसका उत्तर भी वही है जो पहले था कि ये कथाएं हिन्दुत्व का हिस्सा नहीं हैं | ये वेदों में कहीं दृष्टिगोचर नहीं होती और वस्तुतः वेदों में इस स्वरुप की कोई भी कथा नहीं है | इस्लाम और ईसाईयत के विपरीत हिन्दू धर्म में इन कथाओं के लिए कोई स्थान है ही नहीं | हिन्दू धर्म पूर्णतः सिद्धांतों और आदर्श संकल्पनाओं पर आधारित है | कथाएँ समय -समय बदलती रहती हैं, वो परिवर्तित की जा सकती हैं, उन में जोड़-तोड़ की जा सकती है, उन्हें दूषित किया जा सकता है, वे विस्मृत हो सकती हैं या उनमें कुछ भी किया जा सकता है | परंतु धर्म सनातन है अर्थात् शाश्वत है -जो पहले भी एक ही था और आगे भी वही होगा| प्र.

धर्म की दूसरी कसौटी हैं वेद| सभी हिन्दू ग्रंथ सुस्पष्ट और असंदिग्धता से वेदों को अंतिम प्रमाण मानते हैं |अतः कुछ भी और सबकुछ जो वेदों के विपरीत है, धर्म नहीं है |मूलतः ऊपर बताई गई दोनों कसौटियां, अपने आप में एक ही हैं किन्तु थोड़े से अलग अभिगम से |३.योगदर्शन में यही कसौटी थोड़ी सी भिन्नता से यम और नियमों के रूप में प्रस्तुत की गई है –यम – अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य (आत्म-संयम और शालीनता), अपरिग्रह (अनावश्यक संग्रह न करना)|नियम – शौच (शुद्धि), संतोष, तप (उत्तम कर्तव्य के लिए तीव्र और कठोर प्रयत्न), स्वाध्याय या आत्म- निरिक्षण,ईश्वर प्रणिधान (ईश्वर के प्रति समर्पण)|४.

हिंदुत्व के प्रत्येक वर्ग द्वारा अपनाई गई, इन आधारभूत कसौटियों को स्पष्ट करने के बाद, हम इन आक्षेपों का जवाब बड़ी ही आसानी से दे सकते हैं क्योंकि अब हमारा दृष्टिकोण बिलकुल साफ़ है – हम उनका प्रतिवाद नहीं करते बल्कि उन्हें सिरे से नकारते हैं| उ. हिन्दू धर्म के मूलाधार वेदों में – इन में से एक भी कथा नहीं दिखायी देती | प्र.

वास्तविक हिन्दू धर्म जो वेदों पर आधारित है ( वैदिक धर्म ) और जिसे हम आज अज्ञानतावश अपनाये बैठे हैं – इन दोनों में निश्चित तौर पर अंतर है |२.पर यह फर्क हिन्दू धर्म के नहीं बल्कि उसके अनुगामियों के दोष इंगित करता है | मैं जाकिर नाइक से एक बिंदु पर सहमत हूं कि ‘ कार की परख उसके चालक से नहीं, उसके इंजिन से की जानी चाहिए | इसी तरह, हिन्दुत्व का मूल्यांकन वेदों से और उसके मूलभूत सिद्धांतों से किया जाना चाहिए ना कि गलत अनुगामियों से या मिथ्या कथाओं से – जो बाद में गढ़ ली गईं |३.यह सही है कि आज के प्रचलित स्वरुप में हिन्दू प्रथाओं में ( सामान्यतः ) कई खामियां हैं, जैसे-– जन्मगत जाति व्यवस्था का होना जो समाज को खंडित कर रही है |– अपने मूलाधार वेदों और वैदिक धर्म की अवहेलना करना |– ऊपरी दिखावे पर भरोसा करना और हर किसी पर आसानी से विश्वास करने की प्रवृत्ति |– झूठ और अधर्म से सख्ती से निपटने में बचते रहने की आदत |– लव जिहाद के बढ़ते खतरे, धर्मांतरण के वायरस, छद्म धर्मनिरपेक्षता की मनोवृत्ति, इत्यादि की तरफ़ निष्क्रिय रवैया रखना |– अपने धर्म के मूल और उसके तत्वों को जानने में कम रुझान रखना, इत्यादि हिन्दुओं की दुर्दशा के कई कारण हैं |निश्चित तौर पर हम इन सभी से छूटने का प्रयास कर रहे हैं ताकि धर्मांतरण के वायरस से हम अपने धर्म का रक्षण कर सकें और वैदिक आदर्शों के समीप पहुँच सकें |४.

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